गुरुवार, 29 जुलाई 2010

क्या राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के पदों पर बैठा व्यक्ति अगर कानून के खिलाप आचरण कर रहा हो तो उसके खिलाप आवाज उठाना जुर्म है ....?


बड़ा अजीब सवाल है क़ी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का पद बड़ा या पदों पर बैठा व्यक्ति ...?

ये एक ऐसा सवाल है जो ह़र हिन्दुस्तानी को आज परेशान कर रहा है देश और समाज के दर्दनाक अवस्था को महसूस करने के बाद | ह़र कोई आज यह सोच रहा है क़ी क्या देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के पदों पर बैठे व्यक्ति के लिए कानूनसंगत आचरण करना जरूरी नहीं है ? क्या ऐसा नहीं करने वालों पर आपराधिक लापरवाही के साथ-साथ देश के संबैधानिक पदों क़ी गरिमा व सम्मान को ठेस पहुँचाने तथा अधिकार के दुरूपयोग का मामला नहीं चलाया जाना चाहिए ? 
अब सवाल उठता है क़ी जब संबिधान में यह व्यवस्था है क़ी कानून क़ी नजर में सब बराबर है तो देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के पदों पर बैठे व्यक्ति पर सीधे आरोप कोई नागरिक क्यों नहीं लगा सकता है ?
जब कलाम साहब राष्ट्रपति थे तो उन्होंने राष्ट्रपति के पद पर बैठे व्यक्ति को भी लोकपाल के दायरे में लाने क़ी बात कही थी जो एक सच्चे राष्ट्रपति के उतरदायित्व को दर्शाता है | क्योंकि जब राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ही अपने कार्यों क़ी जाँच का अधिकार किसी आम नागरिक को नहीं देना चाहेंगे तो देश में पारदर्शिता और कानून क़ी नजर में समानता का सिद्धांत को कैसे लागू किया जा सकता है |

आज सारा देश शरद पवार के बारे में क्या-क्या नहीं बोलता है रोज अख़बारों में इस भ्रष्ट मंत्री के कारनामों क़ी चर्चा होती है | सुप्रीमकोर्ट ने भी अनाज क़ी बर्बादी को गम्भीर अपराध माना | जिसके लिए कृषि मंत्री के नाते शरद पवार अपराधी हैं या शरद पवार जाँच कर उन अधिकारियों को तुरंत बर्खास्त कर आरोप पत्र दाखिल करें जिनकी लापरवाही से महंगाई बढ़ी है और अनाजों क़ी बर्बादी हुई है ,ऐसा करना शरद पवार क़ी जिम्मेवारी है  और इसी काम के लिए उनको तनख्वाह मिलती है | ह़र विभाग में सतर्कता विभाग के होते हुए भी गम्भीर घोटाले हो रहें है जिससे साबित होता है क़ी ऊपर से ही भ्रष्टाचार को संरक्षण और सुरक्षा प्रदान क़ी जा रही है | 

क्या मंत्री सिर्फ संसद के प्रति जिम्मेवार है ? जनता के लिए न्याय,ईमानदारी और कर्तव्यों के प्रति उनकी कोई बफादारी व जिम्मेवारी नहीं ? शरद पवार का बयान क़ी वे सुप्रीमकोर्ट नहीं बल्कि संसद के प्रति जवाबदेह हैं ,यह बयान अपने आप में अपराध है और देश के राष्ट्रपति प्रधानमंत्री इसे साबित नहीं करना चाहें तो न्याय अपने आप में सवाल है ?
देश के प्रधानमंत्री योजना आयोग के अध्यक्ष हैं लेकिन नरेगा,इंदिरा आवाश या किसान ऋण कोई भी योजना इस तरह से नहीं बनाई जा रही जो असल जरूरतमंद को फायदा पहुंचा सके | क्या हमारे योजना आयोग के नीती निर्माताओं में इतनी काबिलियत नहीं है क़ी वे ऐसी  योजना बना सके जिसमे भ्रष्टाचार को रोकने वाली कई स्तरीय सुरक्षा हो ? या हमारे प्रधानमंत्री भ्रष्टाचारियों और सत्ता के दलालों के आगे लाचार है ? पिछले दिनों नीरा राडिया कांड के बाद चर्चा जोड़ों पर थी क़ी "इस देश को संसद नहीं अब पैसा चलाएगा" ये बातें छोटी बातें नहीं हैं ,ये बातें प्रधानमंत्री के कार्यप्रणाली में आपराधिक लापरवाही के संकेत देते हैं ? क्या इसके लिए प्रधानमंत्री से देश क़ी जनता सिर्फ चुनाव में ही पूछ सकती है या किसी भी वक्त प्रधानमंत्री के ऊपर कर्तव्य निर्वाह और अधिकार के प्रयोग में गम्भीर लापरवाही के लिए अदालत में जनहित याचिका के जरिये देश के प्रधानमंत्री से पूछ सकती है ? कोई ऐसा कानून नहीं जो यह कहता हो क़ी प्रधानमंत्री किसी आरोपों का न्यायसंगत व तर्कसंगत जवाब नहीं देंगे |

देश के राष्ट्रपति पद पर बैठा व्यक्ति देश के सेना का सर्वोच्च सेनापति होता है ,न्याय क़ी मर्यादा क़ी रखवाली का भी सर्वोच्च जिम्मा देश के राष्ट्रपति पर ही है | क्या सेना में बढ़ते भ्रष्टाचार और न्याय व्यवस्था में अन्यायिक देरी के समाधान तथा न्याय पैसों के बल पर नहीं बल्कि सत्य और ईमानदारी के आधार पर मिले इसकी कोई ठोस व्यवस्था नहीं होने के लिए देश के राष्ट्रपति से जवाब नहीं माँगा जाना चाहिए ? देश के राष्ट्रपति को नैतिकता के नाते यह भी अधिकार है क़ी देश में कानून व्यवस्था क़ी हालात के जमीनी हकीकत क़ी समीक्षा कर उसके सुधार के लिए सुझाव देकर प्रधानमंत्री को आगाह करे ,आज देश में भय और अराजकता का इतना गम्भीर माहौल बना हुआ है क़ी लोग थाने में शिकायत लिखवाने तक जाने से डरतें हैं ,क्या ऐसे हालात के लिए देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को दोष नहीं दिया जाना चाहिए ?
निश्चय ही भ्रष्टाचार क़ी पहुँच और असर अब देश के इन दो सर्वोच्च पदों को भी प्रभावित कर रहा है | जनता को जागरूक होने क़ी जरूरत है और निडरता से पत्र और इ.मेल के जरिये इन दोनों पदों पर बैठे व्यक्ति को भी उनके कर्तव्यों और अधिकारों के समुचित प्रयोग के प्रति समय-समय पर आगाह करने क़ी जरूरत है और उनकी कमियों को भी उन्हें बताने क़ी जरूरत है |

कहते है क़ी अगर कोई कमी बताने वाला ना हो तो अच्छे से अच्छा व्यक्ति भी सुख-सुविधा के मद में अपने कर्तव्यों को भूल जाता है और अधिकारों का दुरूपयोग करने लगता है और इस वक्त देश क़ी स्थिति को देखकर यह कहा जा सकता है क़ी  हमारे देश के इन दोनों पदों पर बैठे व्यक्तियों को उनकी कमियों को बताने क़ी सख्त आवश्यकता है | 

जनहित और मानवहित में किसी भी व्यक्ति क़ी जाँच करने तथा किसी पर भी सच्चा आरोप लगाने से कोई भी कानून अगर रोकता है तो वह कानून संबिधान क़ी उस अबधारणा क़ी अवमानना है क़ी कानून क़ी नजर में ह़र कोई बराबर है तथा ह़र किसी को कानून क़ी एक सामान सुरक्षा मिलनी चाहिए | ये अलग बात है क़ी भ्रष्टाचार क़ी व्यापकता और दोषियों पर कार्यवाही क़ी व्यवस्था के मृतप्राय हो जाने से जमीनी हकीकत कुछ और है और इसके लिए भी हमसब ही जिम्मेवार हैं ...हम किसी से कुछ नहीं पूछते हैं और ना ही किसी को उसकी जिम्मेवारी के ईमानदारी से निर्वाह के लिए बाध्य करते है ,जबकि  प्रतिदिन के बिभिन्न प्रकार के टेक्स से हम सत्ता में बैठे ह़र व्यक्ति को तनख्वाह देते हैं ...चाहे वह प्रधानमंत्री हो या राष्ट्रपति ...

लेकिन क्या इस स्थिति को चुप-चाप देखने से सुधारा जा सकता है या जनहित में सत्य के लिए निड़र होकर जो भी दोषी या लापरवाह हो के खिलाप आवाज को बुलंद करने से ? फैसला आपको करना है .... सत्यमेव जयते 

नोट-चित्र जनहित क़ी उपयोगिता के चलते गूगल से साभार प्रकाशित है ,किसी के एतराज पर हटा दिया जायेगा ..

4 टिप्‍पणियां:

  1. लड़ाई छेड़ी जानी चाहिए मगर परिणाम बहुत उत्साहवर्द्धक नहीं रहे हैं क्योंकि व्यक्तिगत स्वार्थों के कारण भुक्तभोगी भी संगठित विद्रोह नहीं करना चाहता।

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  2. सबसे पहले तो आपको सलाम ... इस शानदार लेख को को प्रस्तुत करने के लिए.... आपके मुहीम में मैं आपके साथ हूँ... बहुत ही विचारणीय आलेख...

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  3. लेख बहुत अच्छा है लेकिन हर बात के लिए हम प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति या नेताओ को दोष नहीं दे सकते है | दोष आम आदमी का भी है यह ठीक है कि भ्रष्टाचारियो को नेताओ का समर्थन मिलता है पर सरकारी पदो पर बैठा आदमी तो आम आदमी ही है ना उसकी भ्रष्टता हमें हर रोज सीधे प्रभावित करती है | काला बाजारी रोकने के लिए या खुले में रखे सड़ते अनाज को बचाने के लिए किसी कार्यवाही के लिए किसी सरकारी कर्मचारी को शरद पवार से इजाजत लेने कि जरुरत नहीं है वो उसक कर्तव्य है जो वो नहीं कर रहा है | लोग कहते है कि नेता भ्रष्ट है इसलिए नीचे के लोग भी भ्रष्ट है पर मुझे लगता है कि नीचे के पदो पर बैठा आम आदमी भ्रष्ट है इसलिए नेता भी भ्रष्ट है क्योकि नेताओ को पता है कि जब सभी किसी न किसी रूप में सभी भ्रष्टता में लगे है तो मुझे कौन हटाएगा सब खाने कमाने में व्यस्त है | नेता निति, कानून बनाते है पर उसे लागु करना नीचे के पदो पर बैठे लोगों को करना है जो नहीं कर रहे है यदि वो ईमानदारी से काम करने लगे तो कोई नेता क्या कर सकता है कितने लोगों का तबादला करेगा | पहले हम सुधारे फिर दूसरो को सुधारने कि बात करे |

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  4. @ अंशुमाला जी

    आज भ्रष्टाचारी आम आदमी मजबूरी में बन रहा है ,जमीनी स्तर पर हालात इतने बुरे हैं की किसी को भी सत्य की राह और भ्रष्टाचार के बिना एक कदम चलने नहीं दिया जाता है ,देश और समाज में भय का वातावरण इतना व्याप्त है की अच्छे -अच्छे IAS और IPS भी डरतें हैं तो आम आदमी की क्या बात करें | हाँ कुछ लोग हैं जो जान हथेली पर रखकर चलते हुए अच्छा काम और प्रयास कर रहें हैं इसलिए यह देश और समाज घिसत कर भी आगे बढ़ रहा है | सबसे बड़ी समस्या है शिकायत पर दोषियों के खिलाप प्रशासनिक कार्यवाही और इस प्रक्रिया को भ्रष्ट मंत्रियों और अधिकारीयों के गठजोड़ ने समाप्त कर दिया है जिससे स्थिति और भी गंभीर हो गयी है |

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